भुला दिया है उसको पर हर दो कदम पे पैरों के निशा उन्ही के है,
ठंडी हवा झुके पत्ते उनसे टपकती बूंदे,
समंदर से उठती लहरे रेत के किनारो तक आके टूटती लहरे,
वो कुछ डूबा डूबा सा सूरज दूर दिखती कसती एक माझी,
इन में उनमे बस्ती यादे उन्ही की है,
आसमा में फडफडाते पंछी बादलों से कुछ झांकता सा चंदा,
कही दूर जलती आग कुछ हलकी सी भीड़ भाड,
रौशनी को निगलता अँधेरा चांदी से चमचमाते तारे,
इन में उनमे बसता हर ख़ामोशी का शब्द उन्ही का है,
ऊँचे पर्वत बर्फ से ढका आधार,
कुछ बलखाती नदिया पत्थरों के टुकड़े,
इन में उनमे बसती हर शरारत उन्ही की है,
चल पड़ा हू उनको भुला कर पगडंडियों पे मैं,
पर हर दो कदम पे पैरों के निशा उन्ही के है.....
-सोलंकी मैंडी
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