Tuesday, January 17, 2012

कुछ ऐसी थी वो ....

दो लव् दिखे कुछ ठिठके से मनो कुछ अधूरे लवज आ रुका थे उन लवो तक,
वो बड़ी बड़ी सी खामोश आंखे थी एक टक देखती मुझको मनो कुछ अधूरा ख्वाब आ रुका था उन तक,
वो कुछ सिकुड़ी सी बौहे इस कदर बेचन थी मनो तरसती थी एक दूजे से मिलने को,
वो कुछ तेज सांसे थी उनकी मानो लाखो बाते कह गई उन्ही सांसो में ,
जकडी उंगलिया कपकपाती रही उन हथेलियों में,
मानो पाना चाहती थी पनाह मेरी कुछ पीछे खिची हथेलियों में,
कुछ थकी थकी सी थी उनकी वो निगाहे इस कदर,
मानो ढूँढती थी अनजान भीड़ में मेरे ही निगाहों को,
कुछ सरकता सा था उनका अंचल इस तरह आवारा सा,
मानो बुलाता सा था मुझे आपने आगोश में,
न कहते हुए भी अनगिनत अल्फाज बयान कर गए उनके वो इशारे,
मानो जो रुके परे थे लबो के किनारों तक,
कुछ रुकी सी थी वो मेरी राहों में आके,
मानो हमसफ़र की तरह आखरी सफर तक,
दो लव् दिखे कुछ ठिठके से मनो कुछ अधूरे लवज आ रुका थे उन लवो तक,
वो बड़ी बड़ी सी खामोश आंखे थी एक टक देखती मुझको मनो कुछ अधूरा ख्वाब आ रुका था उन तक.....
- सोलंकी मैंडी

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