दुनिया में कितने मोहब्बत के बीमार बैठे हैं,
चमन उजड़े हैं फिर भी गुलजार बैठे हैं,
आशिकी में पतलून भी पैजामा हो गयी,
माँ भी कहती है, साहब बेरोजगार बैठे हैं,
जानते है सब की क्या है मोहब्बत का हश्र,
ज़माने हाथो में लिए तलवार बैठे हैं,
फिर भी सनम की दीवानगी की खातिर,
हम लहरों में बिना पतवार बैठे हैं,
कितने लुटे कितने तबाह हो गए मोहब्बत में,
और कितने यहाँ तैयार बैठे हैं,
इसी आवारगी का नाम मोहब्बत है शायद,
पर लोग कहते हैं मजनू बीमार बैठे हैं....
-सूरज
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