ये दुनिया का मेला,ये यादों का रेला,
कभी कूक कोयल की,कभी मैं अकेला,
ये वादे,ये यादें,डगमगाते इरादे,
सभी ने सभी से ये रिश्ते हैं बांधे,
कभी तो लगे की हैं राहें अँधेरी,
कभी खुद सवेरा दिखाए उजाला,
कभी कुछ न चाहा, कभी कुछ न माँगा,
मिला को खुदा से,उसी में निभाया,
लगे क्यों ये ऐसा,नहीं कुछ भी मेरा,
कभी कूक कोयल की कभी मैं अकेला,
ये राहों के कांटे ,ये पावों के छाले,
कहाँ चुप के रोयें,कहाँ दर्द बांटे,
मुझे बस लगे ये,कि मजिल बुलाती,
मुझे अपनी बाँहों में गाकर सुलाती,
खलिश होगी पूरी,न हूँगा अकेला,
मुझे है यकीं ये,कि होगा सवेरा,
उसी दिन लगेगा,ये कैसा उजाला,
मेरे ख्वाब सारे,न होगा संभाला,
यही तो है शायद,वो ख्वाबों का डेरा,
वो चाहों कि बंशी,वो यादों का मेला.....
-सूरज
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