Sunday, February 19, 2012

जब देखता हूँ

जब देखता हूँ खुद को आईने में,
मुझे कही तुझ पे कुर्बान एक आशिक नजर आता है,
वो जो देख सकता है सब ,
कह सकता है सब,
पर छू नहीं सकता तुझे ,
जब नाम लेता हूँ तेरा खामोशी से,
दिल का तार छू जाता है कही,
वो जो सुन सकता है सब ,
समझ सकता है सब,
पर अल्फाज बया कर सकता नहीं ,
जब गुजरती है तू सामने से कभी,
अनजाने से कहकहे बन जाते है तभी,
वो जो रुक सकते है सब ,
थम सकते है सब,
गर हकीकत में पूरे हो सकते नहीं ,
जब रह गया राह में अकेला यूँ अभी,
जाम तेरे नाम का ले चुका हूँ अभी
यूँ ही हँस सकता हूँ मै ,
रो सकता हूँ मै,
पर दर्दे-ए -दिल हलक पे ला सकता नहीं,
अब देखता हूँ खुद को आईने में कभी ,
हर आशिक का चेहरा दिखाई देता है मुझे......
-सोलंकी मैंडी

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